गुरुवार, १० दिसम्बर २००९

गीत को उसके ही माध्यम से जानना और नमित हो जाना... विरक्ति के बाद अनुरक्त होना, फिर जीवन खपाना... जहाँ से हम फिर देखना शुरू करते हैं, तसल्ली से किसी इल्ली द्वारा खाया गया टेड़ा-मेढ़ा आधा -अधुरा पत्ता पूरे जीवन की मानिंद

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कुछ गीतों के पास हम जाते हेँ ,और कुछ हमें बुलातें हेँ ,जिनकी आद्रता हमारे मन प्राण और आँखों में बस जाती है उन गीतों की सच्चाई और संवेदना हमारी चेतना को छूती ही नहीं, हमारी आत्मा को थाम भी लेती है. दुःख जैसे शाश्वत सच को सुख में तब्दील करने वाला संगीत, ऐसे गीतों में किसी दुनिया को, उसके इंसान को, और इस दुनिया के अभिशप्त चरित्रों को बदलने का कोई दावा नहीं होता, एक गुज़ारिश होती है... एक धीमी दस्तक... और आहिस्ता से किसी गीत का बन जाना. इन गीतों के द्वारा न ज़िन्दगी के कोई नियम टूटते हैं, ना क्रांतियाँ होती हैं... बस कुछ स्वर लहरियां होती हैं, जिसमे बहुत कुछ हमारा भी घुला-मिला होता है. इन गीतों का सूनसान चाहे जितना हमें बोझिल करे, लेकिन कुछ अनसुनी पदचापें कई नए आयामों को रचती आहटें हमारे करीब होती हैं. देश काल से परे जहाँ कुछ भी हो सकता है, एक सम्मोहन; छूटे हुए प्रिय; प्रिय चीज़ों; घटनाओं; प्रिय शब्दों;प्रिय कविताओं; और इत्मीनान से की गयी, अचाही विदा के बाद लौटते - लौटाते कुछ सुर, कुछ गीले बिम्ब, दूसरों के द्वारा नहीं... गीत को उसके ही माध्यम से जानना और नमित हो जाना... विरक्ति के बाद अनुरक्त होना, फिर जीवन खपाना... जहाँ से हम फिर देखना शुरू करते हैं, तसल्ली से किसी इल्ली द्वारा खाया गया टेड़ा-मेढ़ा आधा -अधुरा पत्ता पूरे जीवन की मानिंद .

फिल्म "बेनजीर" - १७ जून १९६४ को रिलीज़ हुई थी, इसके प्रोडूसर- "विमल रॉय" और संगीतकार - "एस .डी.बर्मन", गीतकार - "शकील ब्दायुनी" जी हैं. फिल्म के मुख्या किरदार - मीना कुमारी, अशोक कुमार, शशि कपूर, तनूजा इत्यादि थे... इसमें एक गीत तनूजा पे फिल्माया गया था. ब्लैक एंड व्हाइट में बनी इस फिल्म में खासकर इस गीत में तनूजा ने कशिश्भरी अदाकारी की है... लता मंगेशकर द्वारा गाया ये गीत, राग तिलक कामोद केदार पर आधारित है... गीत के पहले अंतरे में "तू" पर जोर देकर, लय को तोड़कर आगे बढता स्वर और अंत में "आ sss मेरी राहों को जगमगा दे sss " (अवग्र के साथ). गीत के पैरा का अंत एक विनम्र गुज़ारिश के साथ आपको सम्मोहित किये बिना नहीं रहता.
इसी तरह दूसरे अंतरे में "जी चाहता है तुझपर सदके बहार कर दूँ " और अंत तक आते - आते एक आर्त चीत्कार.. एक ऐसा उदास भाव हठात आपमें घर करता है बावजूद एक अतिरिक्त उर्जा वातावरण में अनायास पनप उठती है... इस गीत में ऐसा ज़रूर है जो मंत्र मुग्ध करता है, सुख और दुःख को एकाकार भी... शास्त्रीय संगीत में थोड़ी भी रूचि रखने वालों ने तो इसे सुना होगा लेकिन जिन्होंने नहीं सुना उन्हें इसे सुनना चाहिए... लता जी के अद्भूत स्वर में इस गीत को सुनने के बाद. आप अपनी आत्मा; देह;और स्वर को एकसाथ चमत्कृत कर अनंत और शाश्वत को छूकर लौटते हैं...

"मिल जा रे, जाने जाना... मिल जा रे...
आँखों का नूर तू है, दिल का करार तू है...
अपमा तुझे बना लूँ, मेरी ये आरजू है...
आ मेरी ज़िन्दगी की राहों को जगमग दे,
वल्लाह कदम-कदम पर, तेरी ही जुस्तजू है...
मिल जा रे..."
"जी चाहता है तुझपर, सदके बहार कर दूँ...
तेरी खुशी पे अपनी, दुनिया निसार कर दूँ...
वो प्यार की घडी जो, तेरे हुज़ूर गुज़रे,
उसको कसम खुदा की, में याद गार कर दूँ...
मिल जा रे ...."

सोमवार, २३ नवम्बर २००९

//-जो बार-बार मिलता-बिछड़ता है , -मन रूक सा जाता है.. उसका बोलना पानी के बीच घुलता जाता है.-एक नया मौसम इस मौसम के विरुद्ध हो जाता है...

लगातार होती बेमौसमी बारिश से आँगन की दीवारों से प्लास्टर छोटे-बड़े टुकड़ों की शक्ल में झड रहा-था,जिस दीवार से सटकर दोपहर की हलकी अप्रत्याशित धूप में थोड़ी देर बैठकर वो कुछ पढ़ना चाहती थी.लेकिन उसे इरादा बदलना पडा,खिड़की से आती मामूली धूप के लकीर नुमा टुकडे के साथ बाहर देखते हुए,---बारिश,धुंद,धूप,कोहरे की मिली-जुली ढलती दोपहर में पेड़ों के पत्ते नीले-नीले से दिखाई पड़ते हें ....अभी-अभी धूप थी ओर बस अभी बूंदा-बांदी शुरू ---पानी की हल्की बूंदों के पार खूबसूरत अंदाज में पिघलती कुछ सपाट आकृतियाँ आकार लेती है शाम की शुरुआत होना ही चाहती है,अध् पढ़ी कहानी का पृष्ट बिन मोड़े ही वो गोद में उलट देती है ..तुरंत ही गलती का अहसास ,अब फिर सिरा ढूँढना होगा दुबारा शुरू करने के पहले,-कहाँ छोड़ा था,क्या ये मुमकिन होगा शुरुआत से पहले छूटे हुए कथा सूत्र को पकड़ पाना,एक ख्याल गाथा नया सिरा पकड़ लेती है , उधेड़बुन के साथ -सच कुछ भ्रम भी जरूरी है अच्छे से जीने के लिए ..पर मन की तरह मौसम भी बेहद खराब है,यहाँ ..ओर वहां ?इस सवाल का जवाब उसे नहीं मिलना था जो नहीं होगा उस इक्छा की तरह ..मन की खिन्नता के बावजूद उसका इन्टेस चेहरा खिल उठा शायद मोबाईल के साइलेंट मोड़ में रौशनी जल-बुझ उठेगी बिन आहट सोचना ....लेकिन उम्मीद से थोड़ा ज्यादा किसी भी नतीजों पर ना पहुँचने वाले फैसले एक झिझके हुए दिन के साथ अनुनय करते समय के बरक्स .. उदास-निराश होकर रह जाते हेँ,ताज़ी यात्रा में देखे सागौन के पेड़ों पर कच्चे -हरे फल पिछली यात्रा की जरूरी घटनाओं की तरह याद आतें हेँ ...फिर नया कुछ ,पानी में निथरा हुआ -आधा तर -एक साफ चेहरा ओर कई रंगों की बे शुमार भीड़ में फबता सा उस पर काला रंग.. देखी -सोची चीजें आहिस्ता से करवटें लेती -धीरे-धीरे जागती है ,एक लम्बी खामोशी में पढ़ना- जीना ज्यादा सोचना ,कितना सजीव हो उठता है -जब परिंदे घर लौटने की तैयारी में होतें हेँ बिन भूले अपने ठौर -ठिकाने .ओर अपनी नन्ही आँखों से आकाश से नीचे छूटते घर ,पेड़ पत्तियां पहाड़ --चोंच में दबाये मूल्यवान स्मृतियाँ -ओर जोखिम भरी इक्छायें वैसी ही जो हमारी जरूरतों की तरह ठोस थी-सच थी,यकायक सुखों का फूलों में खिलना,दुखों का द्रश्य में तब्दील होना ...वो दायें हाथ को बाएं कंधे पर ओर बाएं हाथ को दायें कंधे पर रख ,दोनों को एक साथ मोड़कर उसमें अपना चेहरा धंसा लेती है वो समय कैसे तय हुआ वो समझ नहीं पाती ,कुछ जिद्दी पल कोहनी से टकराते हुए -झांकते से उसका चेहरा टटोलने की कोशिश करते हेँ ...बारिश की नमी वहां तब तक अपनी मौजूदगी दर्ज कर चुकी होती है, किसी खेल में सावधानी के बावजूद पिट जाना, भाग्य का खेल, नहीं...हानि -लाभ ,जीवन-मरण ,यश-अपयश ,जीत -हार,बिन बोला भी सच रह जाता है, ओर ज्यादा सच डायरी में दर्ज.प्रवंचनाये टूटती है ,समेटी खुशबू उड़ जाती है मौसम के रंग फीके पड जातें हेँ,स्मृतियाँ धुन्द में खोती जाती है ,चाँद से मन अघा जाता है गीतों का शौर कानो को रास नहीं आता, अविकल बहती हुई , किसी इबारत में ना समा पाने वाली इच्छाएं किसी अनासक्त लय का पीछा करती हेँ ओर निरंतर बदलती अपनी दुनिया के आकाश की निसीमता में नक्षत्रों के शब्द बनाना और मेहँदी भरी खुशबू की हथेलियों से उसका नाम लिखना ...दुखों के ढेर में एक बड़ा, असीम सुख ,एक अर्थ के करीब पहुँचते -पहुँचते दूसरे अर्थ का सामने आजाना --झुके -तने पेड़ों के बीच अवस्थित खपरैल के छत्त वाली झोपड़ियाँ काश की वहां दो क्षण सुस्ता पाते ,ओर नीले गुलाबी रेशमी बादलों के टुकड़े कार के शीशे के परे पीछे छूटते और इच्छाओं की प्रबलताओं ओर निर्बलताओं के के बीच बार-बार पढ़े गये दुर्लभ प्रसंग की तरह सामने आते हेँ जीवन के गाढे उन्माद - में रोज उग आने वाले नए दुखों के बीच ----जो नहीं कहा ,सुन लिया गया उधर ये क्या कम है, वो सर उठाती है बीच नर्मदा से महेश्वर घाट देखना ,घाट की सतह पर किला ,किले की सतह पर पत्थरों के बीच हरी नर्म घास ओर उसका चेहरा हर जगह यहाँ-वहां सुपर इम्पोज हो जाता है हमेशा यही चाहना क्यों जो सबसे अच्छा पल है सबसे मीठा -सबसे अधिक सुखद सबसे विस्मयकारी कोई और भी देखे ,सुने,संग संग ओर ये जो फूल दिन भर आँगन में गिरते रहते हेँ इनकी आहट भी,उनके रंगों के साथ पर ..-एक नया मौसम इस मौसम के विरुद्ध हो जाता है आजकल नवम्बर में भारी वर्षा ओर तूफान की चेतावनी ... अनेकों सुर्योदयों -सूर्यास्तों के बीच जो बार-बार मिलता-बिछड़ता है , -मन रूक सा जाता है उसका बोलना पानी के बीच घुलता जाता है.-एक नया मौसम इस मौसम के विरुद्ध हो जाता है आजकल नवम्बर में भारी वर्षा ओर तूफान की चेतावनी... बारिश में चेखव को पढ़ना ....ओर इस मौसम में जब ना ठंडक है ना गर्माहट - दुःख है ना सुख ,दोस्तोव्यस्की को ....दोस्तोव्यस्की की एक लम्बी कहानी ''दिल का कमजोर -कल ही ख़त्म की है वे कहतें हेँ जीवन की चेतना जीवन से बढ़कर है ओर सुख के नियमों की जानकारी सुखों से बढ़कर है ..शाम का अन्धेरा कमरे में इकठा होता है ,दरवाजे पर कुछ पल ठिठके हुए -एक धनात्मक उम्मीद के साथ ,गीतों किताबों ओर उनकी रौशनी में ......देर रात उसने न्यूज़ चेनल पर देखा समुद्र तटीय राज्यों महाराष्ट्र ओर गुजरात से फयान गुजार गया ,ख़तरा टल गया ..
कोई देता है दर -ए दिल से मुसल्सल आवाज,और फिर अपनी ही आवाज से घबराता है...अपने बदले हुए अंदाज का अहसास नहीं उसको ,मेरे बहके हुए अंदाज से घबराता है ..(- कैफी आजमी)

रविवार, १५ नवम्बर २००९

मणिपुर की लोह स्त्री शर्मीला की कहानी - शर्मीला समय की उचाइयों पर...




मणिपुर की रहने वाली शर्मिला इरोम की ९ साल पहले एक सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार के रूप मैं पहचान थी ,वो स्थानीय समाचार पत्र मैं महिला मुद्दों पर बेबाक लिखा करती थी,लेकिन शर्मिला से जब मैं ७ मार्च २००९ को मिली तब वो एक कैदी थी और उसी दिन उसे मणिपुर के स्थानीय जवाहरलाल नेहरु अस्पताल के उच्च सुरक्षा वार्ड से रिहा किया जा रहा था दरअसल ११सितम्बर १९५८ मैं बने ए ऍफ़ एस पी ए [आर्म्स फोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट ]जिसे पूर्वोतर राज्यों अरुणाचल मेघालय असम मणिपुर नागालेंड और त्रिपुरा जैसे राज्यों मैं सेना को विशेष ताकत देने के लिए पारित किया गया था ]शर्मिला ने इस एक्ट के खिलाफ अकेले आवाज उठाई ,वर्तमान मैं शर्मिला के हक और पक्ष मैं सैकडों आवाजें मणिपुर की घाटियों मैं लगातार गूंज रही हें ...अपने राज्य मैं ए ऍफ़ एस पी ए की क्रूरता ,भ्रष्टचार और अमानवीयता के खिलाफ और इस एक्ट को समाप्त करने एवं अपने राज्य मैं शान्ति स्थापित करने के लिए उसने पिछले तकरीबन .9 सालों से मुँह से पानी की ना तो एक बूँद ग्रहण की है ना भोजन किया है ...उसे जबरदस्ती नाक से नली [ट्यूब ]द्वारा भोजन -पानी दिया जाता है ,साल मैं वो एक बार रिहा होती है और दुसरे दिन पुनः गिरफ्तार कर ली जाती है उसके रिहा और गिरफ्तार होने का सिलसिला पिछले 9 वर्षों से लगातार बदस्तूर जारी है,शर्मिला आज बेशक समय की ऊँचाइयों पर है ,कोई मिसाल उस जैसी फिलवक्त देश भर मैं नहीं, लेकिन इन बीते वर्षों मैं उसकी आवाज केंद्र सरकार तक नहीं पहुँच पाई यह अफ़सोस जनक है..हाल ही मैं युवा सांसद अगाथा संगमा ने १८ जून को शर्मिला से जेल मैं मुलाक़ात कर उसकी मांग को सरकार के सामने रखने का आश्वासन दिया है और कहा की वो इस काले कानून को रद्द करने के लिए केंद्र सरकार से मांग करेंगी और इस मुद्दे को प्राथमिकता देंगी उन्होंने एक लिखित ज्ञापन देकर प्रधान मंत्री से इस मामले पर मुलाक़ात कर अनशन पर बैठी शर्मिला के जीवन को बचाने की अपील भी की है
शर्मिला का संघर्ष .9 वर्ष पूर्व 2 नवम्बर 2000 मैं तब शुरू हुआ जब वो इम्फाल से १५ किलोमीटर की दूरी पर सालोम नामक एक छोटे से गाँव मैं एक शान्ति मार्च की तैयारी कर रही थी ,उसी वक़्त आसाम रायफल्स द्वारा बेहद क्रूरता के साथ १० सिविलियंस को मार डाला गया,जिनमें एक ६५ वर्षीय बूढी औरत के साथ राष्ट्रीय बहादुरी पुरूस्कार प्राप्त बालक भी था शर्मिला ने उसी वक़्त निर्णय लिया,की कुछ अर्थ पूर्ण करना होगा अपनी माँ से आर्शीवाद लेकर उसने उसी जगह से भूख हस्ताल शुरू की जहाँ उन १० निर्दोषों को मारा गया था लेकिन दुसरे दिन ही अंडर क्रिमिनल लों-आई .पी सी ,की धारा ३०९ के तहत उसे गिरफ्तार कर लिया गया ....सबसे शर्मनाक पहलु ये है की इन 9 वर्षों मैं शर्मिला के रिहा और गिरफ्तार होने के बीच मणिपुर मैं कही कोई तबदीली नहीं हुई -लोग बेघर होते रहें बच्चे अनाथ,औरतें, विधवा, और निर्दोष मारे जाते रहें ...और ये सिलसिला आज भी जारी है ,इसी वर्ष जन-फरबरी के मध्य ९० लोगों को बेक़सूर मार डाला गया इस अंतहीन क्रूरता के कारण ही यहाँ [यु जी एस] अंडर ग्राउंड ग्रुप्स का दबदबा बढ़ता ही जारहा है एक अनुमान के अनुसार ५५ हजार सिक्युरिटी फोर्स ढाई करोड़ जनसंख्या के ऊपर है मिलेट्री का इतना बड़ा भाग शायद ही दुनिया के किसी हिस्से पर हो ...पिछले १० सालों में यहाँ मानव अधिकारों के लिए सक्रिय संगठन बढ़ते ही जा रहें हें इनलोगों के लिए ये एक मुश्किल भरी चुनौती भी है
शर्मिला इरोम के पक्ष मैं घाटियों मैं रहने वाला [शर्मिला कनबा लूप]..सेव शर्मिला कैम्पेन ...ने शर्मिला के पक्ष मैं संगठात्मक क्रमिक भूख हड़ताल के साथ गोष्ठी भी लागतार की हें यहाँ ये बता देना जरूरी है की शर्मिला कनबा लूप दरअसल मायरा पेबी ग्रुप का एक भाग है और मायरा पेबी ग्रुप औरतों का एक पारम्परिक जमीनी नेट वर्क है .ये औरतें माइती औरतें कहलाती हें ,जो गावों- शहरों और मणिपुर की घाटियों मैं कार्यरत हैं ,ये शराब-ड्रग्स और स्त्री के प्रति अमानवीयता के खिलाफ रैलियाँ निकालती हें इनके साथ नागा वूमेन यूनियन संगठन भी जुड़ा हुआ है ,जो की वहां की १६ जनजातियों को मिला कर बनाया गया है ये पहाडियों घाटियों मैं अथक काम कर रहें हें और इस वक़्त शर्मिला के संघर्ष मैं हमकदम होने के साथ-साथ ए ऍफ़ एस पी ए विरोध मैं भी है
ए ऍफ़ एस पी ए[स्पेशल आर्म्स फोर्स पॉवरएक्ट ]१९५८-से जमू कश्मीर और उतर पश्चिम राज्यों मैं कई सालों से लागू है ये एक्ट इंडियन मिलेट्री और पैरा मिलेट्री फोर्सेस को ये पॉवर देती है की वो कोई भी ढांचा नष्ट या ख़त्म कर सकती है चाहे कारण छोटा ही क्यों ना हो ,साथ ही किसी को भी शूट या गिरफ्तार भी जो की अपराधिक श्रेणी मैं नहीं आता. जिसके फलस्वरूप निर्दोषों को लगातार मारा जाता रहा है ..हालांकि इस एक्ट के खिलाफ री-अपील की जब मांग जोर शोर से उठी तब भारत सरकार ने एक कमेटी के प्रमुख के रूप मैं रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट के जज और फारमर चेयर ऑफ़ द ला कमीशन -जीवन रेड्डी को परिक्षण हेतु नियुक्त भी किया, बाद मैं अनेक मुश्किलों के चलते २००५ मैं एक रिपोर्ट पेश की गई जिसमे अलग अलग राज्यों के लोगों और आर्म्स फोर्स के नजरिये से युक्ति-युक्त तरीके से इसे समझना था --ये रिपोर्ट आधिकारिक तौर पर तो पेश नहीं की गई किन्तु एक नेशनल डेली-[द हिन्दू ]के जरिये सामने जरूर आई जिसमे इस री-अपील का समर्थन किया गया था
बाद मैं [स्पेशल आर्म्स फोर्स पॉवरएक्ट के जुल्मों के खिलाफ विश्व इतिहास मैं एक एसा मामला दर्ज हुआ जो रोंगटे खडे कर देने के लिए काफी था और ये सच भी है की कांगला फोर्ट के उस गुम्बद के नीचे से गुजरते हुए हम उन औरतों की मुश्किलों- मजबूरियों -उनके जज्बे -होंसले को अपने अन्दर भी जज्ब और महसूस कर पा रहे थे...वो काला किस्सा ये था की ११जुलाइ २००९ को जब थंगजम मनोरमा नामक एक युवा लड़की को उसके घर से उठाकर उससे बलात्कार और प्रताड़ना के बाद आसाम रायफल्स द्वारा मार डाला गया परिणाम स्वरूप मायरा पेबी संगठन की १२ औरतों [युवा इमा -माताओं ने आसाम रायफल्स हेड क्वाटर्स इम्फाल के एतिहासिक कांगला फोर्ट पर नग्न मार्च परेड निकाली उनके हाथों पर पर बैनर्स पर लिखा हुआ था "इंडियन आर्मी रेप अस" ,उस वक़्त मानव अधिकारों के लिए लड़ रहे कई औरतों के संगठनों ने अपने अपने तरीकों से विरोध
किया ये लोग वही थे जो शर्मिला को मजबूती से सहयोग कर रहे थे
अक्टूबर २००६ मैं शर्मिला जब रिहा हुई तब वो चुपचाप दो तीन संगठनों के साथ देहली आगई..देहली मैं जंतर-मंतर पार्लियामेन्ट स्ट्रीट पर उसने धरना दिया और अपनी आवाज बुलंद की पुनः उसे गिरफ्तार किया गया और एम्स मैं भर्ती कर दिया गया कुछ दिनों बाद फिर उसे मणिपुर जेल भेज दिया गया शर्मिला मणिपुर की जेल मैं आज भी जिंदा है उसका जीवन ख़त्म हो रहा है ,और उस जैसी सैकडों लड़कियों -औरतों आदमियों को अन्याय का शिकार होना पड रहा है, मणिपुर की स्थानीय पत्रकार अंजुलिका ..ने हमें ३० मिनिट की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बताई जिसमें अन्याय की शिकारविधवा और उनके परिवार महिलाओं की व्यथा दर्ज है.
जब ७मार्च २००९ को शर्मिला को रिहा किया जा रहा था तब अलग -अलग राज्यों से मौजूद महिला पत्रकारों की भारी तादाद मौजूद थी ..शर्मिला अपने समर्थकों और नेकेड प्रोटेस्ट की कुछ औरतों के साथ अस्पताल के भीतर ही बने एक किलोमीटर की दूरी पर बने शिविर तक पैदल चलकर पहुंची,उसका चेहरा शांत और झक्क सफेद था शर्मिला के पक्ष मैं १० दिसम्बर २००८ से मायरा पेबी की औरतें भूख हड़ताल पर हें शर्मिला साफ और धीमे बोलने वाली स्त्री है हर दिन योगा करती उसके भाई सिंघजीत इरोम ने बताया शर्मिला से हमें मिलने मैं दिक्कत आती है ... उसने मीडिया से चंदबातें मणिपुरी में जो कही थी वो यह की "आप लोगो ने जो यहाँ मेरा इंतज़ार किया उसके लिए धन्यवाद जैसे शब्द छोटे हैं, मेरी शक्ति द्विगुणित हुई है... मैं अपना ये कैम्पेन लगातार जारी रखूंगी, मेरे राज्य की घाटियों में सुन्दर फूल खिलते हैं, जल है और नैसर्गिक सुन्दरता है लेकिन जहाँ औरतों को कैद में रखा जाता है. मैं उम्मीद करती हूँ की सभी बहने मेरे राज्य की कहानी अपने साथ ले जाएँ, मेरी आवाज़ बने, मुझे जिंदा रखने में सरकार अपनी बोहोत सी शक्ति और धन खर्च कर रही है..." क्या ये ठीक है?
शर्मीला आश्वस्त है की सरकार इस तरफ देखेगी, इस अन्याय के खिलाफ उसके राज्य को न्याय मिलेगा. शर्मीला का कहना है की कमल के पत्ते पर ओस की बूंद की तरह वह हवा में नहीं बहना चाहती जिसका कोई उद्देश्य न हो.
(मणिपुर से लौटकर)
इसी वर्ष ७ मार्च को मेरी मुलाकात शर्मीला इरोम से इम्फाल में हुई थी, जब उसे इम्फाल के एक स्थानीय "जवाहरलाल नेहरु" अस्पताल के उच्च सुरक्षा वार्ड से रिहा किया जा रहा था, तब मैंने उसे बेहद नज़दीक से देखा जाना और सुना था... उसके साथ उसके समर्थकों की भारी भीड़ थी. मणिपुर की यह लोह स्त्री - iron women, सही मायनो में इस बात को सच साबित करती है.
शर्मीला की यह कथा वैसे तो देश के एक बड़े हिन्दी अखबार में प्रकाशित होनी थी जो मुझे ना छपने पर लौटाई नहीं गयी, जिसे मैंने CD (compact disk) में दिया था, अतः उसे मुझे ज्यों का त्यों अपने ब्लॉग पर देना पड रहा है, जिसे आज से आठ माह पहले लिख चुकी हूँ... और आज प्रकाशित कर रही हूँ. जैसा की मैंने पूर्व में प्रकाशित अपने लेख "इम्फाल में मानवीय अधिकारों के हनन का सिलसिला जारी" में उल्लेख किया है... (औरत संगठन फॉर पावर सोसायटी की ओर से...)
शर्मीला इरोम के पक्ष में सारी दुनिया से अपील करते हुए,..... इसी नवम्बर में जिसे 9 साल पूरे हो गए हैं, जेल की सीखचों के पीछे...

गुरुवार, ५ नवम्बर २००९

उसका खुश चेहरा,और सात तालों में कैद चुप्पी बोलती है घोलती है --बेखबर, जलतरंग की झिलमिल / / -


एक छोर से आसमान ढह गया
धूल-धूसरित,
धरती भी थोडी सी डूबी,
और जम गई -इस बीच एक धुन्द सी
और ये कहते -कहते
रुंध गया है गले में ये जो ,कुछ
एक ही समय में ,
अगम राह में निर्जन
इकठ्ठा कोई संत्रास ,
भीतर-बाहर उफनता है
ये तो ..ठीक नहीं
धूप सर पर है
और नापना शून्य को है
अपने ही भीतर निमग्न होते
एक निमिष आकाश को
रंग उडे ख्यालों की अद्रश्य उदासी
नहीं, सबसे अलग खोजा उसने,
अभिमंत्रित एक शब्द
तुम्हारे होने ना होने की जगह
उस बबूल के पेड़ तले
ताजे,छोटे, गोल, पीले रेशमी फूलों की ,
महमहाती छावं में
वक़्त रुकता नहीं
जहाँ रूकती है दृष्टी
उसी वक़्त तुम सुनते हो
,मन्नाडे की पुरअसर आवाज
"हंसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है"
टूटा-फूटा वर्तमान छूट रहा है
एक भरा-पूरा भविष्य हो सकता है
इक्छाओं को टोह देती है ,
नेक नियत- सधे हुए ढंग से
रंग उडे ख्यालों को रंगना
बिसराए जाने से पहले
ताज़ी स्मृति बनना
और उन्हें देखना -देखते रह जाना
जहाँ से गुजरता है
''प्रेम '' प्रवासी पक्षी सा
एक नया सूर्योदय
भुरभुरी रौशनी के साथ उभरता है
एक निराकार अंधेरे के बाद
उसका खुश चेहरा,और
सात तालों में कैद
चुप्पी बोलती है
घोलती है --बेखबर,
जलतरंग की झिलमिल

आँखों में देखकर मिरी, तुफाने मौजे खूं... चढ़ने से पहले, वक़्त का दरिया उतर गया...
जो मौत के जवाब में रहता था, पेश-पेश, वो ज़िन्दगी के चंद सवालों से डर गया... (-नजीर फतेहपुरी)


गुरुवार, ८ अक्तूबर २००९

प्रेम से ऊर्जा ...उर्जा से क्रिया शीलता ,क्रिया शीलता से रौशनी और रौशनी से सुघड़ता ...//-


र साल दिवाली आती है मनो- कूढा-करकट हम घर से बाहर फ़ेंक देतें हें पर मन मस्तिष्क पर जमा थोडी भी धूल हम नहीं उतार पातें हें ... लाख गुनी ग्यानी कह गये की मन का मनका फेर .पर अब तो सब कुछ असंभव लगता है ..ये भी सच है की किसी के मन में हम चाहे जितना गहरा झाँक लें और चाहे जितनी पैनी हमारी खुर्दबीनी नजर हो, तो भी बहुत कुछ जान नहीं पाते, ऐसे कई लोग हमारे आस-पास ... बस एक फूहढ़ अंदाज में जिए जातें हें और उनकी उम्र'' दिन गिनती ना जाने कितनी दिवालियाँ पीछे ठेलती आगे बढती जाती है ...ना दिलों में रौशनी होती है ,ना घरों में ....ज़रा विस्तार से सोचें ..हमारी किताबों पर जमा धूल जिनका एक पेज भी ना खुला हो ,यदि गमलों में जमा घास -खरपतवार उग आई हो ,दीवारों का पलस्तर उखड गया हो ,कपडे की सीवन उधड जाए तो मन दुखता है रंग-रोगन सिलाई की जरूरत होती है रसोई के डिब्बे इधर-उधर हो जायें,प्याज की टोकरी में प्याज कम छिलके ज्यादा हों,अलमारी की सतह पर धूल हो उसके अन्दर कपडों की भरमार हो,प्रेस किये कपडें सलवटों से भरें हों अन्य उपकरणों वाशिंग मशीन, सिलाई मशीन,ए.सी में मेल दाग-धब्बे उभर आये,परदों से छन्न कर आती रौशनी फीकी लगने लगे,अचार मुरब्बों की बरनी के नीचे लगे कागज़-कपडों पर तेल मसाले के छींटेंलग जाए अच्छी सफाई ना होने के कारण ड्रेसिंग टेबिल पर बाल रह जाए मंहगे जूतों-चप्पल की तली से धूल मिटटी चिपक कर एक इंच तक उठ जाए शिफान जार्जेट की साडियों के पेटीकोट फाल से ऊपर होने के कारण साडी की किनारी घिस कर उधड जाए तो ऐसी मैली फूह्ढ़ता के लिए कौन जिमेदार होगा?क्या हर दिन या दो दिन में इन कामों पर फोकस करने की जरूरत नहीं? आप करें या नौकर से कहें ...क्या जरूरी है दिवाली पर ही सब कुछ किया जाए ,सारा कचरा घर से बाहर किया जाए...
हमारी एक परिचिता बरसों रद्दी इकठ्ठा करके उन्हें दिवाली पर बेचती रही पति सरकारी विभाग में पी. आर. ओ थे जाहिर सी बात है दुनिया भर के अखबार उनके यहाँ पहुँचते थे इस तरह दस-पन्द्रह तोला सोना उन्होंने बनाया ..लेकिन उस रद्दी को सहेजने में ,कीडो-काक्रोंचों से बचाने में उन्हें कितनी मशक्कत करनी पड़ी होगी ये भी सोचें , आप इसे सुघड़ता भी कह सकतें हें वाह रद्दी से सोना ...एक अन्य महिला पुराने कपडे सहेजे रहने में सुख पाती है बस यही कहती हें पति ने पहली वेडिंग एनिवर्सरी पर दी या माँ ने जनम दिन पर या की कालेज के दिनों की ये ड्रेस है जब दुबली -पतली थी बस मन को ऐसी ही फूह्ढ़ता से संतुष्ट करती है लेकिन किसी जरूरतमंद को नहीं देगी .....एक नव धनाड्य मेरी महिला मित्र ने बताया की उसके यहाँ कोई नौकर नहीं टिकता अब इसके कारण बहुत से हो या चाहे जो हो ,लेकिन साथ ही उसका ये भी कहना था की कोई त्यौहार हो या मेरे फार्म हाउस पर पार्टी हो ,या घर में कोई कथा हो में इन्हें कपडा खाना भरपूर देती हूँ मेरी समझ से मेंने जो जाना वो ये की ,गरीब नौकर मेरी इस मित्र का देना अपना अधिकार समझ रहे थे ,जो कपडा भोजन दक्षिणा उन्हें मिला ...वो किसी ना किसी को मिलता सो उन्हें मिल गया मित्र का कहना था की इतना देतें हें फिर भी नमकहरामी करतें हें ..क्या ये दिमागी फूह्ढ़ता है या चालाकी ?... मेरे आँगन में सौ -दो सौ फूल रोजाना खिलतें हें जिनकी लतरें बाहर सड़क की और फैली हुई है सुबह की सैर को जाने वाले बुजुर्ग और स्कूली बच्चे अधिकाँश फूल तोड़ लेतें हें पडोसी शिकायत करतें हें मुझे कोई शिकायत नहीं, जबकि में अक्सर अपने पडोसी को भी निर्लिप्त भाव से फूल तोड़ते देखती हूँ ..तब भी रोजाना कई फूल बच जातें हें हर बरसात में कलम बीज से तय्यार कुछ ख़ास पौधे बांटने में सुख मिलता है ये एक लंबा सिलसिला होता है कभी उनके घर जाओ पौधे बडे हुए और उनमे खिले हुए फूलों को देखना ...एक अव्यक्त ख़ुशी होती है देने बांटने की चीजें फूल पौधे कोई मांगे और उन्हें ना दिए जाए ऐसी फूह्ढ़ता कोई निभा सकता है भला ...
कुछ लोगों के पास शार्ट कट होतें हें जो अपने ही में एक सुखी संपन्न जीवन बिता कर दुनिया से अलविदा हो जातें हें और कुछ लोग तमाम काबलियत और ईमान दरी के बावजूद वो नहीं पा-पाते जिनके वो काबिल होते हें जिनकी उन्हे चाहना होती है फिर भी वो जिन्दगी जीतें हें अपनी कमियों और अच्छाइयों को नई व्यवस्था में किसी नए रूपक में बांधकर एक सुख में डूबकर और कुछ ठीक इन से उलट अपने ही ढर्रे पर चलने वाले ...पर जी ,इस दुनिया में सुघड़ता से जीने के लिए एक दिमागी प्रबंधन की भी जरूरत होती है की कब करें क्या करें कैसे करें और क्या ना करें और जब आप अपने को निर्देश देतें हें या दो टूक निर्णय सुनातें हें ..हाँ या नहीं ..... कुछ बातें क्या जायज हें? ...?आपका हमारे घर में प्रवेश मय जूतों चप्पलों से और हम आपके यहाँ नगें पैरों, आपके घर हम बिना इजाजत बिना प्रयोजन के बैठक से आगे ना जा पायें...हमारे घर में आप बेडरूम से बालकनी छत्त तक घूम आयें क्या ये फूह्ढ़ता है या सहजता?, आपको हम सादर आमंत्रित करे भोजन में अचार मुरब्बों से लेकर चटनी-पापड से लेकर जायके दार खाना खिलाएंऔर आपके घर में हमें फ्रिज का बासी खाना गर्म करके परोसा जाए ....कुछ रिश्ते जिन्दगी की कड़ी धूप में.. साए की तरह हो तो .जीना आसान हो जाता है कि .जब मिलो तब दिवाली सा आनंद मन उठा सके ...
एक और महिला हर दिवाली पर बड़ी और महंगी खरीददारी करती है ,साल भर वो चीजें उनके यहाँ इधर-उधर लुढ़कती दिखाई पड़ती है ..फिर अगली दिवाली तक वो बेवजह बाइयों में बंट जाती है ,ना वो नौकरी करती हें ना पति की कमाई में कोई इजाफा,सुबह बारह बजे तक अलसाए पड़े रहना ,दिन का खाना-नहाना चार बजे तक, रात बारह बजे तक अकारण जागना उनकी दिन चर्या है उनकी फूह्ढ़ता की अन्नत कथा है रौशनी कहाँ नहीं करने की जरूरत है बताना मुश्किल होगा ...एक और मेरी अच्छी दोस्त ...अच्छे पद पर खासा कमाती है मेरी पसंद की कायल जो मेरे पास हो वो सब उसके पास होना चाहिए ..साडी -कपडों से लेकर ना जाने क्या-क्या ..इसमें कोई हर्ज भी नहीं..में कहती भी हूँ मुझे साथ ले चलो खरीदो मेरी पसंद से,नहीं अपनी खरीददारी गुप्त रखेंगी मुझे वितृष्णा होती है ...मुझे ये भी लगता है कि.कामो का संधान व्यवस्था से ही तो हो सकता है बजाय नक़ल से?एक और स्त्री का घर हमेशा बैठक में गीला तौलिया गीलेपन की बदबू के साथ महंगे चमकीले कुशन के बीच सिमटा हुआ फैला हुआ मिलेगा किचिन में पैर रखने की जगह नहीं, कहीं कटी हुई सब्जी खुली हुई तो, कहीं सिंक में झूटे बर्तनों का ढेर फ्रिज में बासी खाने के ढेरों डिब्बें ...कहीं दूध खुला हुआ तो कही गैस पर दाल सब्जी पैर पसारे हुए उनके यहाँ हमेशा मिल जायेंगे..वे .खासा कमाती है नौकर भी है फिर भी.....अपने ही बनाए हुए नर्क में जीने मरने की अभ्यस्त ऐसे कूड़े करकट के साथ जिन्दगी बिताते लोग..मुझे आर्श्चय होता है ...अपने रोजमर्रा के दायित्वों को पूरा किये बिना कैसे बाहरी काम कर पातें होंगे ....बर्ट्रेंड रस्सेल की "कान्क्वेस्ट" का अनुवाद जब पढ़ा तो लगा सच.हांसिल करना... जीतना अपने को, अपने बलबूते पर आसान है ..कठिन नहीं ...और उस आसानी में घर का शामिल होना जरूरी है वो भी रौशनी से भरा और ये कहना बिलकुल सही होगा की............ एकरसता से उब पैदा होती है ,फूह्ढ़ता से वितृष्णा ...इससे बचना ही चाहिए....और प्रेम से ऊर्जा ...उर्जा से क्रिया शीलता ,क्रिया शीलता से रौशनी और रौशनी से सुघड़ता ...जो हमारी चेतना को लगातार बींधती है ताकि हम-आप एक साफ दिल- दिमाग से जी पायें और लोगों को भी जीने दें ...
बहुत भारी होता है जीवन का सार मित्र,बुलाती सी चमक सुदूर के सितारों की,अंधेरों में डूबे तुझ से मांगते जवाब है ..अंधेरों से...अन्जोरे में निकल चल [मुक्तिबोध] अँधेरा और उसका मिथकीय चित्रण मुक्तिबोध की सभी रचनाओं में मिल जता है ..अज्ञान का अँधेरा व्यवस्था जन्य अँधेरा,मन के भीतर छिपे बैठे अँधेरे, सब पर मुक्तिबोध की द्रष्टि है ..अंधेरों में ही भय होता है पहचान खोने का जीवन लक्ष्य से भटकने का [दीपावली कि अनंत शुभकामनाएं ]